Satya Darshan

धन की कमी से जूझ रही न्यायपालिका के लिए 'बही-खाते' में कुछ नहीं

नयी दिल्ली | जुलाई 12, 2019

धन की कमी से जूझ रही न्यायपालिका के वित्तीय संसाधन जटिल एवं अलग-अलग हैं। अदालतों का कामकाज चलाने के लिए केंद्र या राज्यों के बजट में अलग से कोई प्रावधान नहीं होता है। इसके चलते केंद्र एवं राज्यों के विभिन्न अधिकरणों के बीच काफी सौदेबाजी और दोषारोपण होता रहता है। केंद्रीय बजट सर्वोच्च न्यायालय के लिए फंड आवंटित करता है लेकिन इसमें कर्मचारियों के वेतन एवं प्रशासनिक खर्च भी शामिल होते हैं।

नए बजट में सर्वोच्च न्यायालय के खर्च के लिए 269.48 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है और इतनी ही राशि न्याय प्रशासन के लिए दी गई है। न्यायाधीशों के अनुरोध के बावजूद बजट में मामूली वृद्धि ही की गई है। पहले के तीन बजटों में 258.53 करोड़, 251.06 करोड़ और 255 करोड़ रुपये दिए गए थे। न्यायाधीशों का कहना है कि यह राशि समूचे बजट का महज 0.2 फीसदी ही है।

वर्ष 2019-20 के आम बजट में कानून एवं न्याय मंत्रालय को 3,055 करोड़ रुपये देने का जिक्र है जो गत दो वर्षों में आवंटित 6,326 करोड़ और 4,386 करोड़ रुपये से काफी कम है। इस राशि को सचिवालय, कर अधिकरणों, ई-अदालतों के दूसरे चरण, न्यायिक सुधारों पर अध्ययन एवं शोध योजना और आम लोगों की पहुंच बढ़ाने के अभियान पर खर्च किया जाना है।

इसकी तुलना में कपड़ा मंत्रालय को 4,831 करोड़ रुपये और सांख्यिकी मंत्रालय को 5,231 करोड़ रुपये देने का प्रावधान है। कानून मंत्रालय को आवंटित फंड का कुछ हिस्सा चुनाव आयोग को भी जाता है लेकिन उसके लिए बजट में अलग मद है। 

उच्च न्यायालयों और निचली अदालतों का संचालन राज्य सरकारें करती हैं। लेकिन केंद्रीय बजट के मॉडल होने से राज्यों से कुछ अलग की कल्पना शायद ही की जा सकती है। मुकदमे दायर करने के मामले में केंद्र एवं राज्य सरकारें सबसे आगे हैं। करीब 60 फीसदी विचाराधीन मामले केंद्रीय कानूनों के बारे में हैं। लेकिन राज्यों में इन अदालतों के लिए केंद्र अपनी तरफ से समुचित अंशदान नहीं देता है।

जहां दूसरे विभाग अपना खर्च आवंटित राशि से ही चलाते हैं वहीं न्यायपालिका अपने व्यय की आधे से अधिक राशि का इंतजाम अदालती फीस, स्टांप शुल्क, जमाओं पर ब्याज और अन्य साधनों से कर लेती है। उसके बाद भी अदालतों के रजिस्ट्रार को बुनियादी जरूरतों के लिए विधि सचिवों के समक्ष याचना करनी पड़ती है।

भले ही संविधान की समवर्ती सूची केंद्र को नए कानून का वित्तीय बोझ उठाने के लिए बाध्यकारी बनाती है लेकिन असल में यह भार राज्यों पर ही डाला गया है क्योंकि अधीनस्थ अदालतों की देखरेख राज्य सरकारों केे जिम्मे होता है। अपर्याप्त आवंटन के दुष्परिणाम हर जगह दिखते हैं। आर्थिक समीक्षा में भी इस संकटपूर्ण स्थिति के बारे में उल्लेख है। समीक्षा में अदालतों के भीतर लंबित करोड़ों मुकदमों का भी जिक्र है।

जिला अदालतों में 3.04 करोड़ मामले विचाराधीन हैं जो कुल अदालती मामलों का 87 फीसदी हैं। न्यायाधीशों के लिए कुल 22,750 पद स्वीकृत हैं लेकिन केवल 17,891 पद ही भरे गए हैं। हर साल 746 पद रिक्त हो जाते हैं। सौ फीसदी निपटान का लक्ष्य हासिल करने के लिए एक साल में 2,279 अतिरिक्त न्यायाधीशों की जरूरत है। पुराने लंबित मामलों का पांच वर्षों में निपटारा करने के लिए 8,152 अतिरिक्त न्यायाधीशों की जरूरत होगी।

इन सभी मोर्चों पर उत्तर प्रदेश, बिहार, ओडिशा और पश्चिम बंगाल की स्थिति सबसे खराब है। विधि आयोग ने प्रति 10 लाख आबादी पर 50 न्यायाधीश रखे जाने की अनुशंसा की हुई है लेकिन वर्तमान में यह अनुपात 10 लाख पर 10 न्यायाधीश का ही है।

आर्थिक समीक्षा के मुताबिक अनुबंध प्रवर्तन और फैसले आने में लगने वाला लंबा समय कारोबारी सुगमता की राह में सबसे बड़े अवरोध हैं। लेकिन वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट भाषण में इस गहरे संकट का उल्लेख तक नहीं किया। उन्होंने वैकल्पिक विवाद समाधान प्रणाली या लोक अदालतों के बारे में एक भी शब्द नहीं कहा। कई मुख्य न्यायाधीश न्यायपालिका को लगातार नजरअंदाज किए जाने का मुद्दा उठा चुके हैं।

मौजूदा मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने गत महीने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को तीन पत्र लिखकर न्यायाधीशों की नियुक्ति बढ़ाने और उनकी सेवानिवृत्ति आयु में बढ़ोतरी का अनुरोध किया था। उन्होंने अधीनस्थ अदालतों के दौरों में पाया था कि कुछ न्यायाधीशों के पास अपने चैंबर तक नहीं हैं और उन्हें अदालत के ही एक हिस्से को अपना कार्यालय बनाना पड़ा है।

ऐसे हालात का ही नतीजा है कि अदालतों में मामले दशकों तक खिंचते हैं जिसका फायदा खूंखार अपराधियों और भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे नेताओं को होता है। मामलों के देर तक लंबित रहने से जेलों में भी भीड़ बढ़ जाती है। 

कई विधि आयोगों ने न्यायपालिका की समस्याओं का अध्ययन करने के बाद जो रिपोर्ट सौंपी हैं वे अब भी कानून मंत्रालय की मेजों पर धूल खा रही हैं। छह साल पहले उच्चतम न्यायालय की बनाई एक समिति ने कई सुझाव दिए थे। समिति ने कहा था कि संसद के हर अधिवेशन में कई नए कानून पारित किए जाते हैं लेकिन अदालतों पर उनके वित्तीय असर का अध्ययन नहीं किया जाता है।

विधेयकों के साथ आम तौर पर एक वित्तीय ज्ञापन भी होता है जो उस कानून के लागू होने से पडऩे वाले बोझ की तरफ इशारा करता है। लेकिन उन ज्ञापनों में भी नए कानून से न्यायिक प्रणाली पर पडऩे वाले अतिरिक्त बोझ का ब्योरा नहीं होता है।

ऐसे में नए कानून से अदालतों में आने वाले नए मामलों के लिए जरूरी व्यय का अनुमान लगाकर समुचित बजट प्रावधान भी किया जाना चाहिए। कुछ न्यायविदों का मानना है कि सरकार के तीसरे स्तंभ न्यायपालिका के लिए एक अलग बजट लाया जाना चाहिए।

 

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