Satya Darshan

मोदी जी के नाम एक और 'पाती'

यहां आपके श्री चरणों में दंडवत और करबद्ध प्रार्थना है कि आप इस आर्य और अनार्य के शाब्दिक फेर में मत पड़ना यह सब इतिहासकारों की चालाकी है इसलिए आप उन भूतपूर्व मूर्खों को भी क्षमा कर देना।

भारत भूषण | जुलाई 29, 2019

परम पूज्य, परम आदरणीय,

प्रभुतुल्य श्री नरेंद्र मोदी जी

सादर चरण तो चरण तलुआ स्पर्श भी..

सबसे पहले तो मैं यह बता कर आपको बेफिक्र (वैसे आप किसी बात या चीत की फिक्र करते ही कहां हैं) कर दूं कि मैं कोई जिद्दी या बुद्धिजीवी नहीं बल्कि एक औसत से भी गई गुजरी बुद्धि बाला देहधारी भारतीय हूं जो आप की भक्ति की अनिवार्य शर्त है. इस पात्रता के नाते मैं अपनी व्यथा व्यक्त कर रहा हूं कि वे 49 कथित बुद्धिजीवी जिन्होंने आप को पत्र लिखने की बेहूदी हरकत की घोर राष्ट्र द्रोही हैं.

हे श्रेष्ठों में श्रेष्ठ !, वे घोर अज्ञानी नहीं जानते कि ऐसे पातियों (पत्रों) से आप के कानों में जूं तक नहीं रेंगती इसलिए आप उन्हें मक्खी, मच्छर या खटमल (जैसे परजीवी जो बौद्धिक संक्रमण फैलाते रहते हैं) समझ कर क्षमा कर देना अब आखिर वे जैसे भी हैं हैं तो जन्मना आर्य ही.

यहां आपके श्री चरणों में दंडवत और करबद्ध प्रार्थना है कि आप इस आर्य और अनार्य के शाब्दिक फेर में मत पड़ना यह सब इतिहासकारों की चालाकी है इसलिए आप उन भूतपूर्व मूर्खों को भी क्षमा कर देना. इससे आपकी महानता में और कुछ चांद लग जाएंगे.

हे इंद्रों के इन्द्र !, वे मूर्ख जो मॉब लिंचिंग पर चिंता जो दरअसल में खीझ है जता रहे हैं वे इस महान राष्ट्र के गौरवशाली इतिहास और संस्कृति से बाकिफ हैं कि निचली अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक सब के सब मिथ्या हैं और कुछ स्वार्थी मानवों या दानवों कुछ भी कह लें, इनके द्वारा निर्मित और रचित हैं. न्याय कभी चार दीवारी और बंद कमरों में नहीं होता उसके लिए तो रण भूमि ही उपयुक्त है. जहां न देर होती और न ही अंधेर होता. जिन्हें वे अल्पसंख्यक और दलित कह रहे हैं वे पशुतुल्य जीव हैं इसलिए उन्हें ऑन द स्पॉट दंड मिलना ही चाहिए .

हे प्रभो !, इन घनघोर नास्तिकों की बुद्धि फिर गई है जो वे जय श्री राम के पवित्र नारे को युद्धोन्माद फैलाने जैसा बता रहे हैं. राम नाम की महिमा से अवगत कराने के लिए उन्हें अगुवा कर जबरदस्ती राम चरित मानस का नियमित पाठ पढ़ाया जाना चाहिए और तब तक पढ़ाते, रटाते रहना चाहिए जब तक वे खुद जय श्री राम, जय श्री राम न चिल्लाने लगें. इससे उनका कल्याण होगा और हालिया चिट्ठी लिखने सहित दूसरे तमाम पाप भी धुल जाएंगे.

हे महादेव !, ये निकृष्ट लोग जाने क्यों कानून बनाने की बात कर रहे हैं क्या इन्हें मालूम नहीं कि आप के श्री मुख से कानों को सुख देने वाले जो वचन निकलते हैं वही आजकल कानून होते हैं. क्या जय श्री राम बोलना कोई अपराध है यह नाम तो तारने वाला है इसलिए आप इन मूढ़ और मूर्ख लोगों की बात पर तनिक भी कान न दें. (वैसे यह बात भी कहने की नहीं लेकिन भक्ति के वशीभूत होकर कह दी).

हे महाप्रतापी !, ये अज्ञानी अपनी भ्रष्ट हो गई बुद्धि के चलते कह रहे हैं कि सत्ताधारी पार्टी की आलोचना देश की आलोचना नहीं होती. इन की जिव्हा में निसंदेह कीड़े मकोड़े पड़ेंगे जो ये यह नहीं जानते या फिर जानबूझ कर भी उसे नजरंदाज कर रहे हैं कि राष्ट्र का अर्थ बदले पांच साल गुजर चुके हैं और प्रजा ने पुनः आपको और आपकी पार्टी को ही राष्ट्र पिछली 23 मई को माना है. ये नास्तिक नहीं जानते कि आप ही कल्कि अवतार के प्री एडीशन हैं.

हे महामानव !, आप अत्यंत दयालु हैं जो ये 49 के 49 अभी भी स्वतंत्र विचरण कर रहे हैं क्या यह अभिव्यक्ति की स्वन्त्र्ता का उत्कृष्ट उदाहरण नहीं जबकि अगर आप की दृष्टि अगर बिगड़ गई तो ये तो बिना अग्नि के ही भस्म हो जाएंगे. आप क्रोधित होकर इन्हें निष्कासन की सजा मत सुना देना. आप जल्दबाज़ी मे तीसरा नेत्र भी अभी मत खोलना उसे तो आपात काल के लिए रिजर्व में रखना.

हे यशस्वी !, कल शाम को मेरी ही तरह आपकी भक्ति में लीन एक चैनल का नारद सच ही कह रहा था कि इन लोगों के पास कोई काम नहीं बचा है और इन्हें पश्चिम बंगाल की हिंसा नहीं दिखती क्योंकि इनमें से तीस उसी प्रांत के हैं जहां ममता नाम की एक निष्ठुर स्त्री शासन करती है. वह भी राम नाम से चिढ़ती है अब उसके कुशासन का अंत तय है. आपके भक्त उसे शूर्पनखा और त्रिजटा तक कहते हैं.

हे जनार्दन !,  इस पत्र के भावों से प्रसन्न होकर आप कहीं मुझे कोई पद्म पुरुस्कार प्रदान मत कर देना. इस खुशी को मैं संभाल नहीं पाऊंगा क्योंकि पिछले कोई साढ़े पांच वर्षों से मैं भी अनिद्रा, मधुमेह, कमजोरी (वह वाली नहीं) उच्च रक्तचाप और हृदय संबंधी रोगों व बीमारियों से ग्रस्त हूं. एक अंजाना सा डर मुझे घेरे रहता है जो हर साल 8 नवंबर को और बढ़ जाता है, इसलिए आप कृपा कर मुझे कोई इनाम मत दे देना अन्यथा मेरी देह और आत्मा का चिरंतन संबंध विच्छेद हो सकता है. इसलिए हे कृपालु आप की दया दृष्टि ही मुझ निर्धन बुद्धिहीन, विवेकहीन, रुग्ण लेखक के लिए पर्याप्त है .

चूंकि मैं 49 उन कृतघ्न बुद्धिहीनो से आहत और असहमत था इसलिए मैंने भी चिट्ठी के जरिये अपनी व्यथा आपके सम्मुख व्यक्त कर दी है.

शेष आपका आशीर्वाद है !

करोड़ों की तरह आपका

एक नवजात चरण सेवक

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